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महिलाओं के लिए बने कानून और नियम, क्या आप अपने हक से वाकिफ हैं?

महिलाओं की सुरक्षा के कानून होना अलग बात है और यह कारगर तब तक साबित नहीं हो सकते जब तक कि, आम महिलाओं को इन कानूनों की पूर्ण जानकारी न हो।

Best & Must Know Women Rights that Every Women Needs to Know About
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आज की पोस्ट में मैं आपसे उन नियमों और कानूनों के बारे में बात करूंगी, जो कि हमारे संविधान ने हम महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करने की दृष्टि से बनाए हैं। ताकि यदि हममें से किसी के ऊपर कोई विपत्ति आती है, तो हम खुल कर उसका सामना कर सकें और अपने मौलिक अधिकारों कि सहायता से न्याय पा सकें।

हम एक ऐसे देश में रहते हैं जहां महिलाएं सामान्यतः सुरक्षित नहीं मानी जाती हैं। यह देश ऐसे कई लोगों से भरा पड़ा है जो एक तरफ तो महिला-रुपी देवी की उपासना करते हैं, और वहीं दूसरी ओर उन्हीं महिलाओं को प्रताड़ित करने का कोई अवसर अपने हाथ से नहीं जाने देते। इसीलिए हमारे देश में कई ऐसे कानून और नियम बनें हैं जो महिलाओं को सहायता एवं सुरक्षा प्रदान करते हैं। हालांकि महिलाओं की सुरक्षा के कानून होना अलग बात है और यह कारगर तब तक साबित नहीं हो सकते जब तक कि, आम महिलाओं को इन कानूनों की पूर्ण जानकारी न हो।

हमारे देश में काफी कम प्रतिशत नागरिकों को ही अपने मौलिक अधिकारों का ज्ञान है और केवल वे ही जानते हैं कि कानून का उपयोग सही तरह से कैसे किया जाये। अतः ज्यादातर लोग इस बात का फायदा उठा कर आम नागरिकों को परेशान करते हैं।

अपने बयान को निजी रूप से दर्ज कराने का अधिकार

यदि किसी महिला के साथ किसी भी दर्जे का यौन शोषण हुआ है, तो यह उसका अधिकार है कि वह अपना बयान निजी रूप से न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज करा सकती वह भी बिना किसी और अधिकारी की उपस्थिति में। उस महिला के पास यह भी अधिकार है कि वह किसी महिला पुलिस अधिकारी या कांस्टेबल के समक्ष भी अपना बयान दे सकती है। यह अधिकार महिलाओं को आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा १६४ के तहत प्रदान किया गया है, और पुलिस किसी भी रूप से महिला को सार्वजनिक तौर पर बयान दर्ज कराने पर बाध्य नहीं कर सकती। इसके अलावा, परीक्षण के दौरान यदि महिला को गवाह के तौर पर गवाही देने के लिए कहा जाता है, तो वह अपनी गवाही निजी रूप में भी दे सकती है। कानून महिला को यह अधिकार देता है ताकि, वह सच्चाई कहने में शर्म महसूस न करें, और हर विवरण को विस्तारपूर्वक  देने में सक्षम हों जो कि, जांच को आगे बढ़ाने में मददगार होगा।

गोपनीयता का अधिकार

किसी भी परिस्थिति में पुलिस, मीडिया, या अखबार में बलात्कार की पीड़िता को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। यदि कोई ऐसा करता पाया जाता है तो उसे धारा २२८ए के तहत सजा का प्रावधान है।  यह कानून बनाने के पीछे कारण यह है कि हमारा समाज यौन शोषण की पीड़िता को हीन भावना से देखता है, और उसे सामान्य जीवन नहीं जीने देता। अतः पीड़िता की पहचान छिपाना अनिवार्य है। और फैसला आने बाद अदालत के किसी भी दस्तावेज में पीड़िता का नाम नहीं होता।

सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले महिला की गिरफ्तारी नहीं हो सकती

सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले किसी भी महिला की गिरफ्तारी नहीं हो सकती। यदि पुलिस के साथ कोई महिला कांस्टेबल है तो भी किसी महिला को रात के समय गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। यदि महिला पर कोई गंभीर आरोप भी हो तो भी रात के समय गिरफ्तार करने हेतु मजिस्ट्रेट का लिखित आदेश चाहिए होता है कि महिला को रात में क्यों गिरफ्तार किया जाए? ऐसे कई सारे मामले संज्ञान में हैं जिनमें पुलिस ने महिलाओं को रात्रि के समय गिरफ्तार कर उनका शोषण किया है। इसी कारण से यह कानून बनाया गया और यह आपको केवल दिन के समय पुलिस स्टेशन में मौजूद होने का अधिकार प्रदान करता है।

बलात्कार एक अपराध है न कि कोई चिकित्सकीय हालात

जब किसी महिला का यौन उत्पीडन होता है तो उसका अधिकार है कि वह धारा १६४ए के तहत डॉक्टर को दिखाए जिसमें कि डॉक्टर उसकी एक बलात्कार किट के द्वारा जांच करेगा और उसके शरीर से वीर्य को सबूत के तौर पर एकत्रित करेगा। इसके अलावा डॉक्टर को कोई अधिकार नहीं कि वह यह तय करे कि महिला के साथ बलात्कार हुआ है अथवा नहीं। यह फैसला केवल अदालत कर सकी है क्योंकि यह पूर्ण रूप से एक कानूनी निष्कर्ष है। डॉक्टर का काम सिर्फ इतना है कि वह अदालत में सबूत पेश करे कि पिछले कुछ समय में महिला के साथ यौन सम्बन्ध बने हैं अथवा नहीं।

मातृत्व के लाभ लेने का अधिकार

यदि महिला ने किसी दफ्तर में अपने प्रसव की संभावित तिथि से १२ महीनों के दौरान ८० दिनों के लिए काम किया है, तो उसे मातृत्व लाभ लेने का पूरा अधिकार है। इनमें मातृत्व अवकाश, नर्सिंग ब्रेक, चिकित्सा भत्ता आदि शामिल हैं। कानून यह भी कहता है कि महिला को उसकी गर्भावस्था के दौरान नौकरी से नहीं निकाला जा सकता। महिला को यह अधिकार कानून द्वारा दिए गए हैं, और यदि कोई नियोक्ता इसका पालन नहीं करता है तो वह न्यायिक विवाद में फंस सकता है।

 

पैतृक संपत्ति पर अधिकार

हिन्दू नियम के अनुसार किसी व्यक्ति के पास दो तरह की संपत्ति हो सकती हैं, एक तो वह जो उसने स्वयं अर्जित की हो, और दूसरी वह जो उसे अपने पूर्वजों द्वारा वसीयत में मिली हो। पैतृक संपत्ति का अर्थ पिछले तीन पुश्तों से परिवार में चली आ रही संपत्ति से है, और स्वयं के द्वारा अर्जित की गयी संपत्ति का अर्थ है वह सम्पदा जो व्यक्ति ने स्वयं द्वारा कमाए गए पैसों से अर्जित की है। हिन्दू उत्तराधिकार नियमों में हाल ही में किये गए बदलावों के अनुसार पैतृक संपत्ति के बंटवारा लिंग के अनुसार नहीं होगा, अतः परिवार की महिलाओं का भी पैतृक संपत्ति पर उतना ही अधिकार है जितना कि परिवार के पुरुषों का।

कार्यालय में होने वाले महिला उत्पीडन के लिए एक अलग शिकायत शाखा

यह अधिकार सर्वप्रथम सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रस्तावित “विशाखा दिशा-निर्देश” था एवं उसके पश्चात एक उचित कानून बना जिसमें कि हर कार्यालय में अलग से एक शिकायत निवारण शाखा होना अनिवार्य कर दिया गया है जिसमें कि महिला उत्पीडन से सम्बंधित मामले सुलझाए जा सकें। यह शिकायत निवारण शाखा एक महिला के अधीन होनी चाहिए और इसके ५०% सदस्य महिला होनी चाहिए।

रजिस्टर्ड पोस्ट अथवा ई-मेल द्वारा शिकायत दर्ज कराने का अधिकार

यह विशेषाधिकार केवल दिल्ली की महिलाओं के लिए सुरक्षित है, क्योंकि यह दिल्ली पुलिस के द्वारा प्रस्तावित नियमों में से एक है। इसके अनुसार, यदि कोई महिला किसी परिस्थितिवश थाने में जा कर रिपोर्ट दर्ज नहीं करा सकती तो वह लिखित रूप में अपनी रिपोर्ट रजिस्टर्ड पोस्ट द्वारा डिप्टी-कमिश्नर या समान ओहदे के अधिकारी को भेज सकती है, इसके अलावा वह रिपोर्ट ई-मेल भी कर सकती है। रिपोर्ट मिलने के पश्चात अधिकारी सम्बंधित एस.एच.ओ. (स्टेशन हाउस ऑफिसर) को मामले के जांच करने भेजेगा और उचित कार्यवाही के निर्देश देगा। पुलिस महिला के घर जा कर उसका बयान भी दर्ज कर सकती है।

जीरो एफ.आई.आर.

एफ.आई.आर. के पीछे सामान्य तथ्य यह है कि एफ.आई.आर. (FIR) उस पुलिस थाने द्वारा दर्ज करी जाती है, जिसके थाना क्षेत्र वारदात हुई है। उदाहरण के तौर पर X इलाके में कोई अपराध हुआ है, तो X इलाके के थाने में ही उस वारदात की एफ.आई.आर. दर्ज होगी। हालांकि जीरो एफ.आई.आर. का अर्थ यह है कि सम्बंधित अपराध की एफ.आई.आर. किसी भी थाने में दर्ज कराई जा सकती है। भले ही वह वारदात उस थाना क्षेत्र में हुई हो अथवा नहीं। कई परिस्थितियों में थाना प्रभारी पीड़ित की एफ.आई.आर. दर्ज नहीं करते और उनको दूसरे थाने में जाने पर मजबूर करते हैं। इन्हीं कारणों से पीड़ित को छुटकारा दिलाने के लिए जीरो एफ.आई.आर. का प्रावधान किया गया है।

तो यह थे वे नियम जो कि आपको एक महिला होने नाते जानना अति आवश्यक हैं ताकि आवश्यकता पड़ने पर आप इनका प्रयोग कर सकें।

Written by Girlopedia Staff

Techie by profession blogger by hobby, founder of Girlopedia.

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